शादी और व्यभिचार पर कानून: सच्चिदानंद मिश्रा
हंगामा है क्यों बरपा!!!
व्यभिचार को अपराध न मानने के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गरमागरम बहस जारी है। ज़्यादातर लोग उत्साहित हैं। उच्चतम न्यायालय ने स्त्री और पुरुष दोनों को एक समान स्तर पर रखकर यह निर्णय किया है, जिस कानून को उच्चतम न्यायालय ने निरस्त किया है वह एकदम से दकियानूसी कानून था, स्त्री को उसके अनुसार पति की संपत्ति के रूप में देखे जाने की स्थिति थी। इस तरह के कानून ब्रिटेन, अमेरिका (कुछ एक प्रांतों को छोड़कर), चीन, जापान इत्यादि देशों में हटाए जा चुके हैं। यह वैयक्तिक समानता के संवैधानिक अधिकार के अनुरूप नहीं था। जैसी बहुतेरी बातें की जा रही हैं। सही भी है, इनमें से अधिकांश बातों से तार्किक रूप में असहमत नहीं हुआ जा सकता। वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जो यह कह रहे हैं कि यह निर्णय वैवाहिक संबंधों की पवित्रता के लिए ख़तरा है, व्यभिचार को गैर आपराधिक घोषित करके उच्चतम न्यायालय ने इस देश के लोगों को शादी से बाहर अवैध सम्बन्ध रखने की खुली छूट दे दी है।
मुझे लगता है कि समस्या को सही दृष्टि से देखा नहीं जा रहा है। मुद्दा सिर्फ़ यह था कि व्यभिचार की जो परिभाषा भारतीय दण्ड संहिता में दी गई है वह वैयक्तिक समानता के संवैधानिक मौलिक अधिकार के अनुरूप है या नहीं? उसके अनुसार उच्चतम न्यायालय को चलना चाहिए या नहीं? इसलिए इस मुद्दे पर किसी निर्णय पर पहुंचने के पहले समस्या का सही आकलन कर लेना चाहिए।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 को संक्षेप में देखा जाय तो वह यह थी - "अगर कोई विवाहित पुरुष किसी विवाहित स्त्री के साथ उस स्त्री की इच्छा से संबंध बनाता है तो उस स्त्री का पति व्यभिचार के नाम पर इस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज कर सकता है लेकिन वो पति अपनी पत्नी के खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। साथ ही इस कृत्य में शामिल पुरुष की तटस्थ पत्नी भी उस स्त्री के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं करवा सकती। इसमें ये भी प्रावधान था कि विवाहेतर संबंध में शामिल पुरुष के खिलाफ केवल इस कृत्य में उसकी साथी महिला का पति ही शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करा सकता है।"
इस कारण उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय सचमुच में व्यभिचार के विषय में है ही नहीं। अंग्रेजी में एडल्टरी शब्द का प्रयोग किया जाता है और उसका अनुवाद व्यभिचार कर दिया जाता है। यह ज्यादा से ज्यादा विवाहेतर संबंध के विषय में है। गंभीरता से देखा जाय तो यह विवाहेतर संबंध के विषय में भी नहीं है। व्यभिचार की तथाकथित धारा 497 व्यभिचार के अन्य केसों का तो संज्ञान ही नहीं लेती। जिस तरह किसी विवाहित पुरुष द्वारा किसी विवाहित महिला के साथ बनाया गया संबंध व्यभिचार है तो किसी विवाहित पुरुष द्वारा किसी तलाकशुदा या अविवाहित महिला के साथ बनाया गया संबंध भी नैतिक रूप से व्यभिचार है, जिसके बारे में धारा 497 बिलकुल ही मौन थी। इसी तरह किसी विवाहित महिला द्वारा भी बनाये गये विवाहेतर सम्बंध नैतिक रूप से व्यभिचार के अन्तर्गत ही आते हैं।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विकल्प सीमित थे या तो वह व्यभिचार की परिभाषा को विस्तृत करते हुए इस तरह के व्यभिचार के संदर्भों को भी दण्ड की सीमा में में ले आता। यह एक तरह से लोगों को जबरन नैतिक बनाने का प्रयास होता और उसके दुरुपयोग की भी सम्भावनाएं रहतीं। सचमुच में तो यह कार्य उच्चतम न्यायालय का नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि जो नैतिक रूप से ग़लत हो वह अपराध भी हो यह जरूरी नहीं है। इस कारण उच्चतम न्यायालय ने दूसरा मार्ग अपनाया। व्यभिचार को विवाह विच्छेद का आधार तो अभी भी माना जा रहा है, बस उसको अपराध नहीं माना जायेगा।
जो लोग यह समझ रहे हैं कि इस निर्णय के कारण समाज में व्यभिचार को स्वीकृति मिलने लगेगी, मैं उनको भ्रान्त कहूंगा। वैयक्तिक नैतिकताएं कानून से अनुशासित नहीं होती हैं। कानूनन अपराध होते हुए भी बहुत सारी बुराइयां समाज में हैं और रहेंगी भी। मनु ने कहा ही है प्रवृत्तिरेषा भूतानाम्। इसलिए उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से परेशान और चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। बस एक ऊटपटांग कानून से छुटकारा मिला है।
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